BHARTIYA YADAV MAHASABHA HARYANA

भारतीय यादव महासभा हरियाणा

  • Rao Inderjit Singh Yadav (राव इंद्रजीत सिंह यादव)
    सांसद -गुरुग्राम
    राष्ट्रीय अध्यक्ष : भारतीय यादव महासभा
  • मुख्य कार्यालय : रामपुरा हाउस , रिवाड़ी हरियाणा
  • दिल्ली कार्यालय : लोदी स्टेट, सुब्रमण्यम भारतीय मार्ग, नई दिल्ली
  • दूरभाष : 011-24643265 , 011-24643264

भारतीय यादव महासभा (BYM) की स्थापना एवं परिचय

भारतवर्ष में यादव महासभा की नीवं रेवाड़ी राजवंश के राव बहादुर बलबीर सिंह जी द्वारा रखी गई I उन्होंने यादवों में सामाजिक, सांस्कृतिक,शैक्षिक एवं राजनैतिक चेतना की अलख जगाने हेतु 1910 ई० में “अहीर यादव क्षत्रिय महासभा” का गठन किया| इस संगठन ने यादवों को उनके गौरवमय इतिहास से परिचित करवाने का काम किया | इसके माध्यम से यादव समाज में राजनैतिक एवं सांस्क्रतिक चेतना आयी , रेवाडी, शिकोहाबाद, दिल्ली. कच्छ-भुज , मदुरै तथा देश के कई राज्यों में यादव कॉलेज तथा छात्रावास का निर्माण हुवा , महासभा ने अनेक शाखाओं एवं उपजातियों में विभक्त यादवों को एक छतरी के नीचे लाने का काम किया तथा समाज में व्याप्त अन्धविश्वास, कुरीतियों तथा बाल विवाह जैसे सामाजिक कुप्रथाओं का विरोध किया| राव बलबीर सिंह ने यादवों को गो रक्षा एवं जनेऊ पहनने के लिए प्रेरित किया|

धीरे-धीरे पूरे देश में हर राज्य में यादव समाज के संघठन कार्य करने लगे, देवगिरी राजघराने से सम्बद्ध विट्ठल कृष्ण जी खेडकर, चौधरी बदन सिंह उत्तर प्रदेश, राव छाजूराम तथा राव दलीप सिंह जैसे समाज्सेविओं ने अन्य गणमान्य यादव सरदारों से मिलकर इलाहाबाद में 1924 में देश भर में फैली सभी सभाओ का विलय करके राष्ट्रीय स्तर पर “अखिल भारतीय यादव महासभा” का गठन किया| 1968 के दोरान महासभा के शीर्ष नेत्र्तव में वैचारिक मतभेद उत्पन्न हो गए और महासभा का विभाजन हो गया|

रेवाडी राजघराने से सम्बद्ध राव बीरेंदर सिंह जी ने 1969 में “भारतीय यादव महासभा” का गठन किया और 1972 में इसे विधिवत रूप से दिल्ली में सोसाइटी एक्ट के अंतर्गत पंजीकृत करा लिया I तब से भारतीय यादव महासभा निरंतर समाज हित में कार्य कर रही है जिसने पूरे भारत के यादवो को एकजुट किया तथा कई एतिहासिक एवं सराहनीय कार्य किये i वर्तमान में राव इंदरजीत सिंह जी यादव महासभा के अध्यक्ष हैं|

यदुवंश का इतिहास

परमपिता नारायण ने सृष्टि उत्पति के उद्देश्य से ब्रह्मा जी को उत्पन्न किया. ब्रह्मा से अत्रि का प्रादुर्भाव हुआ. , अत्रि से चंद्रमा, चंद्रमा से बुध, बुध से पुरुरवा, पुरुरवा से आयु, आयु से नहुष, नहुष से ययाति, ययाति से यदु उत्पन्न हुए. यदु से यादव वंश चला|
यदुवंश के संस्थापक यदु, महाराजा ययाति के पुत्र थे। उनका जन्म देवयानी के गर्भ से हुआ। यदु के वन्शज यादव कहलाए। महाराज ययाति के दो रानियाँ थी एक का नाम था देवयानी और दूसरी का शर्मिष्ठा । देवयानी के गर्भ से यदु और तुर्वसु नामक दो पुत्र तथा शर्मिष्टा के गर्भ से दुह्यु,अनु और पुरू नामक तीन पुत्र हुए। ययाति के पुत्रो से जो वंशज चले वे इस प्रकार है;- १. यदु से यादव, २. तुर्वसु से यवन, ३. दुह्यु से भोज, ४. अनु से म्लेक्ष, ५. पुरु सेपौरव।

ययाति ने अपने सबसे छोटे पुत्र पुरु को प्रतिष्ठान की मुख्य शाखा का शासक बनाया। अन्य पुत्रों को दूर-दराज के छोटे छोटे प्रदेश सौंप दिये।
यदु को दक्षिण दिशा में चर्मणवती वर्तमान चम्बल क्षेत्र , वेववती (वेतवा) और शुक्तिमती (केन) का तटवर्ती प्रदेश मिला। वह अपने सब भाइयो मे श्रेष्ठ एवं तेजस्वी निकला। यदु का विवाह धौमवर्ण की पाँच कन्यायों के साथ हुआ था। श्रीमद भागवत महापुराण के अनुसार यदु के चार देवोपम पुत्र हुए जिनके नाम -सहस्त्रजित, क्रोष्टा, नल और रिपु थे। इनमे से सहस्त्रजित और क्रोष्टा के वंशज पराक्रमी हुए तथा इस धरा पर ख्याति प्राप्त किया।
यदु के ज्येष्ठ पुत्र सहस्त्रजित के एक पौत्र का नाम था हैहय। हैहय के वंशज हैहयवंशी यादव क्षत्रिय कहलाए। हैहय के हजारों पुत्र थे। उनमे से केवल पाँच ही जीवित बचे थे बाकी सब युद्ध करते हुए परशुराम के हाथों मारे गए।बचे हुए पुत्रों के नाम थे-जयध्वज, शूरसेन,वृषभ, मधु और ऊर्जित। जयध्वज के तालजंघ नामक एक पुत्र था। तालजंघ के वंशज तालजंघ क्षत्रिय कहलाये। तालजंघ के पुत्रों में एक का नाम था वीतिहोत्र । वीतिहोत्र के मधु नामक एक पुत्र हुआ। मधु के वंशज माधव कहलाये। मधु के कई पुत्र थे। उनमें से एक का नाम था वृष्णि । वृष्णि के वंशज वाष्र्णेवकहलाये।

यदु के दुसरे पुत्र का नाम क्रोष्टा था। क्रोष्टा के बाद उसकी बारहवीं पीढी में 'विदर्भ' नामक एक राजा हुए। विदर्भ के कश, क्रथ और रोमपाद नामक तीन पुत्र थे। विदर्भ के तीसरे वंशधर रोमपाद के पुत्र का नाम था बभ्रु। बभ्रु के कृति, कृति के उशिक और उशिक के चेदि नामक पुत्र हुआ।चेदि के नाम पर चेदिवंश का प्रादुर्भाव हुआ। इसी चेदिवंश में शिशुपाल आदि उत्पन्न हुए। विदर्भ के दुसरे पुत्र क्रथ के कुल में आगे चल सात्वत नामक एक प्रतापी राजा हुए। उनके नाम पर यादवों को कई जगह सात्वत वंशी भी कहा गया है। सात्वत के सात पुत्र थे। उनके नाम थे -भजमान, भजि, दिव्य, वृष्णि, देववृक्ष, महाभोज और अन्धक। इनसे अलग अलग सात कुल चले। उनमें से वृष्णि और अन्धक कुल के वंशज अन्य की अपेक्षा अधिक विख्यात हुए। वृष्णि के नाम पर वृष्णिवंश चला। इस वंश में लोक रक्षक भगवान श्रीकृष्ण ने अवतार लिया था जिससे यह वंश परम पवित्र हो गया और इस धरा पर सर्वाधिक विख्यात हुआ। श्रीकृष्ण की माता देवकी का जन्म अन्धक वंश में हुआ था। इस कारण अन्धक वंश ने भी बहुत ख्याति प्राप्त की।

अन्धक के वंशज अन्धकवंशी यादव कहलाये। अन्धक के कुकुर, भजमन, शुचि और कम्बलबर्हि नामक चार लड़के थे। इनमें से कुकुर के वंशज बहुत प्रसिद्द हुए। कुकुर के पुत्र का नाम था वह्नि । वह्नि के विलोमा, विलोमा के कपोतरोमा और कपोतरोमा के अनु नामक पुत्र हुआ । अनु के पुत्र का नाम था अन्धक। अन्धक के पुत्र का नाम दुन्दुभि और दुन्दुभि के पुत्र का नाम था अरिद्योत। अरिद्योत के पुनर्वसु नाम का एक पुत्र हुआ । पुनर्वसु के दो संतानें थी- पहला आहुक नाम का पुत्र और दूसरा आहुकी नाम की कन्या। आहुक के देवक और उग्रसेन नामक दो पुत्र हुए। देवक के देववान, उपदेव, सुदेव, देववर्धन नामक चार पुत्र तथा धृत, देवा, शांतिदेवा, उपदेवा, श्रीदेवा, देवरक्षिता, सहदेवा और देवकी नामक चार कन्यायें थीं। आहुक के छोटे बेटे उग्रसेन के कंस, सुनामा, न्यग्रोध, कंक, शंकु, सुहू, राष्ट्रपाल, सृष्टि और तुष्टिमान नामक नौ पुत्र और कन्सा, कंसवती, कंका, शुरभु और राष्ट्र्पालिका नामक पाँच कन्यायें।
सात्वत के पुत्रो से जो वंश परंपरा चली उनमें सर्वाधिक विख्यात वंश का नाम है वृष्णि-वंश। इसमें सर्वव्यापी भगवान श्री कृष्ण ने अवतार लिया था जिससे यह वंश परम पवित्र हो गया। वृष्णि के दो रानियाँ थी -एक नाम था गांधारी और दूसरी का माद्री। माद्री के एक देवमीढुष नामक एक पुत्र हुआ। देवमीढुष के भी मदिषा और वैश्यवर्णा नाम की दो रानियाँ थी।

देवमीढुष की बड़ी रानी मदिषा के गर्भ दस पुत्र हुए, उनके नाम थे -वसुदेव, देवभाग, देवश्रवा, आनक, सुजग्य, श्यामक, कंक, शमीक, वत्सक और वृक। उनमें वसुदेव जी सबसे बड़े थे। वसुदेव के जन्म के समय देवताओं ने प्रसन्न होकर आकाश से पुष्प की वर्षा की थी और आनक तथा दुन्दुभी का वादन किया था। इस कारण वसुदेव जी को आनकदुन्दु भी कहा जाता है। श्रीहरिवंश पुराण में वसुदेव के चौदह पत्नियों होने का वर्णन आता है उनमें रोहिणी, इंदिरा, वैशाखी, भद्रा और सुनाम्नी नामक पांच पत्नियाँ पौरव वंश से, देवकी आदि सात पत्नियाँ अन्धक वंश से तथा सुतनु तथा वडवा नामक, वासूदेव की देखभाल करने वाली, दो स्त्रियाँ अज्ञात अन्य वंश से थीं। उग्रसेन के बड़े भाई देवक के देवकी सहित सात कन्यायें थी। उन सबका विवाह वसुदेव जी से हुआ था। देवक की छोटी कन्या देवकी के विवाहोपरांत उसका चचेरा भाई कंस जब रथ में बैठा कर उन्हें घर छोड़ने जा रहा था तो मार्ग में उसे आकाशवाणी से यह शब्द सुनाई पडे -"हे कंस! तू जिसे इतने प्यार से ससुराल पहुँचाने जा रहा है उसी के आठवे पुत्र के हाथों तेरी मृत्यु होगी।" देववाणी सुनकर कंस अत्यंत भयभीत हो गया और वसुदेव तथा देवकी को कारागार में बंद कर दिया। महायशस्वी भगवान श्रीकृष्ण का जन्म इसी कारागार में हुआ था। भगवान श्रीकृष्ण ने देवकी के गर्भ से अवतार लिया और वसुदेव जी को भगवान श्रीकृष्ण के पिता होने का परम सौभाग्य प्राप्त हुआ। वसुदेव के एक पुत्र का नाम बलराम था। बलराम जी श्रीकृष्ण के बड़े भाई थे। उनका जन्म वसुदेव की एक अन्य पत्नी रोहिणी के गर्भ से हुआ था। रोहिणी गोकुल में वसुदेव के चचेरे भाई नन्द के यहाँ गुप्त रूप से रह रही थी।

देवमीढुष की दूसरी रानी वैश्यवर्णा के गर्भ से पर्जन्य नामक पुत्र हुआ। पर्जन्य के नन्द सहित नौ पुत्र हुए उनके नाम थे - धरानन्द, ध्रुवनन्द , उपनंद, अभिनंद, .सुनंद, कर्मानन्द , धर्मानंद , नन्द और वल्लभ । नन्द से नन्द वंशी यादव शाखा का प्रादुर्भाव हुआ। नन्द और उनकी पत्नी यशोदा ने गोकुल में भगवान श्रीकृष्ण का पालन -पोषण किया। इस कारण वह आज भी परम यशस्वीऔर श्रद्धेय हैं। वृष्णिवंश की इस वंशावली से ज्ञात होता है कि वसुदेव और नन्द वृष्णि-वंशी यादव थे और दोनों चचेरे भाई थे।
यदवो ने कालान्तर मे अपने केन्द्र दशार्न, अवान्ति, विदर्भ् एवं महिष्मती मे स्थापित कर लिए। बाद मे मथुरा और द्वारिका यदवो की शक्ति के महत्वपूर्ण एवं प्रभावशाली केन्द्र बने। इसके अतिरिक्त शाल्व मे भी यादवो की शाखा स्थापित हो गई। मथुरा महाराजा उग्रसेन के अधीन था और द्वारिका वसुदेव के। महाराजा उग्रसेन का पुत्र कंस था और वासुदेव के पुत्र श्री कृष्ण थे।

पुराण आदि से प्राप्त जानकारी के आधार पर सृष्टि उत्पत्ति से यदु तक और यदु से श्री कृष्ण के मध्य यादव वन्शावली (प्रमुख यादव राजवंश) इस प्रकार है:- यादव वंश वृक्ष संसार के महानतम वंशों में से एक यादव वंश बहुत विशाल है। परमपिता स्वयम्भू नारायण को सृष्टि का रचयिता माना गया है। परमपिता स्वयम्भू नारायण से ब्रह्मा :-

ब्रह्मा के सात मानस पुत्र हुए :-   1. मारीचि,   2. अत्रि   3.पुलस्त्य ( चंद्रमा | बुध | पुरुरवा | आयु | नहुष | य़यति)   4. पुलह   5. क्रतु   6.वशिष्ठ   7.कौशिक
महाराजा ययाति के दो रानियाँ थीं :-   1.देवयानी   2.शर्मिष्ठा
देवयानी से दो पुत्र हुए :-   1. यदु   2.तुर्वशु
शर्मिष्ठा से तीन पुत्र हुए :-   1.दुह्यु   2.अनु   3.पुरु

महाराज यदु से यादव वंश चला। उनके कितने पुत्र थे इस विषय में विभिन्न धर्म ग्रन्थ एकमत नहीं हैं। कई ग्रंथों में उनकी संख्या पाँच बताई गई है तो कई में चार। श्रीमदभागवत महापुराण के अनुसार यदु के सहस्त्रजित, क्रोष्टा, नल और रिपु नामक चार पुत्र हुए। उनका वंश वृक्ष नीचे दिया गया है:-

यदु के चार पुत्र :-   1. सहस्त्रजित   2. क्रोष्टा   3.नल  4. रिपु
सहस्त्रजित के तीन पुत्र :-   1. हैहय,   2.वेणुहय,   3. महाहय
क्रोष्टा का एक पुत्र :-   1. वृजिनवान

Office Bearers

Bhartiya Yadav Mahasabha Haryana

Sample avatar
Rao Birender Singh

Founder BYM

Sample avatar
Rao Inderjit Singh

National President BYM

Sample avatar
Om Prakash Yadav

State President BYMH

Sample avatar
Meghnath (Ravi) Yadav

State President Youth BYMH